Monday, September 14, 2009

देवी पूजा क्यों?

देवी पूजा क्यों?

Sep 14, 11:14 pm

सनातन धर्म सदा से शक्ति का उपासक रहा है। देवताओं की तुलना में देवियों की उपासना अधिक होती रही है। देवताओं के नामों के उच्चारण में उनकी शक्ति का ही नाम पहले आता है। साधारण देवों की बात क्या करें, संसार के पालनकर्ता विष्णु और महेश के साथ भी यही बात है। विष्णु अथवा नारायण की पत्नी हैं लक्ष्मी, इसलिए हम लक्ष्मीनारायण उच्चारण करते हैं। इसी प्रकार गौरीशंकर या भवानीशंकर संबोधित किया जाता है। विष्णु के अवतार राम और कृष्ण की बात करें, तो हम सीताराम, राधाकृष्ण संबोधित करते हैं।

तात्पर्य यह है कि ईश्वर या देवता से उसकी शक्ति का महत्व अधिक है। इसीलिए एक कवि ने राधा को कृष्ण से ऊपर मानते हुए लिखा—

मेरी भवबाधा हरौ, राधानागरि सोय।

जा तन की झांई पड़े, श्याम हरित दुति होय।।

अपनी सांसारिक बाधा दूर करने के लिए महाकवि बिहारी राधा से ही प्रार्थना करते हैं, न कि कृष्ण से। उनका मानना है कि राधा के प्रकाश के कारण ही कृष्ण का रंग हरा हो गया, अन्यथा वे काले रहते।

और तो और, श्रीराम के परम भक्त गोस्वामी तुलसीदास ने भी सीता का उल्लेख पहले और राम का बाद में किया। उनकी यह पंक्ति सर्वविदित है-

सियाराममय सब जग जानी।

करहुं प्रनाम जोरि जुग पानी।।

कब शुरू हुई शक्ति पूजा

शक्ति की पूजा कब शुरू हुई, यह नहीं कहा जा सकता। यह अनादि काल से होता आ रहा है। कृष्णचरित्र के अनुसार, श्रीकृष्ण की दिनचर्या में दुर्गा की उपासना सम्मिलित थी। श्रीराम ने भी रावण-वध के पूर्व शक्तिपूजा की थी। इसी को आधार बनाकर महाकवि निराला ने अपनी अति प्रसिद्ध कविता 'राम की शक्तिपूजा' लिखी।

वैदिक काल में भी शक्तिपूजा प्रचलित थी। वैदिक साहित्य में विशेषकर यजुर्वेद और अथर्ववेद में शक्तिपूजा का उल्लेख विशेष रूप से प्राप्त होता है। उपनिषदों में भी शक्तिपूजा की प्रधानता है। पुराणों में सर्वत्र शक्ति को महत्व मिला है।

यह उक्ति सभी जानते हैं कि शिव भी शिवा अर्थात पार्वती के बिना निर्जीव के समान हैं। आदि शंकराचार्य ने अपनी प्रसिद्ध कृति 'सौंदर्य लहरी' में स्पष्ट किया है कि शिव जब शक्ति से संपन्न होते हैं, तभी प्रभावशाली होते हैं।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि सदा शक्ति का ही बोलबाला रहा है। मार्कडेय पुराण पर आधारित प्रसिद्ध पुस्तक 'दुर्गासप्तशती' में यह स्पष्ट उल्लेख है कि जिस सिंहवाहिनी दुर्गा ने राक्षसों का वध किया, वे ब्रह्मा, विष्णु और महेश के शरीर से निकली शक्ति से ही निर्मित हुई थीं। इसलिए यदि राक्षसों पर विजय प्राप्त की गई, तो शक्ति ने ही, ब्रह्मा, विष्णु, महेश या अन्य देवताओं ने नहीं।

ब्रह्म से श्रेष्ठ शक्ति

नवरात्र के अवसर पर बहुत से लोग दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं। सामान्य दिनों में भी कई लोग इसका पाठ कर मनोवांछित फल प्राप्त करते हैं। ब्रह्म को सर्वोपरि माना जाता है, लेकिन शक्ति ब्रह्म से भी श्रेष्ठतर है। शक्ति की उपासना के संबंध में विश्व-प्रसिद्ध पीतांबरा पीठ, दतिया के संस्थापक श्री स्वामी जी ने एक श्रद्धालु के प्रश्न के उत्तार में जो कहा उसका तात्पर्य है- 'ब्रह्म तटस्थ है। वह सृष्टि के निर्माण, पालन या संहार का कारण नहीं है। यह सब ब्रह्म की शक्ति द्वारा ही संपन्न होता है। इसीलिए हमें इस शक्ति को माता-स्वरूप मान कर उसकी उपासना करनी चाहिए, तभी हम अपने अभीष्ट को प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार सारा विश्व ही शक्तिमय है।'

शक्ति के महत्व के कारण ही भारत में अनेक शक्तिपीठ हैं। शक्तिपीठों की संख्या के संबंध में भिन्न-भिन्न मत हैं, लेकिन 'तंत्रचूड़ामणि' ग्रंथ के अनुसार, ऐसे 51 शक्तिपीठ हैं। इनमें कुछ प्रमुख के नाम हैं-ज्वालामुखी, कामाख्या, त्रिपुरसुंदरी, वाराही, काली, अंबिका, भ्रामरी, ललिता आदि।

इक्यावन शक्तिपीठ

एक कथा है कि दक्ष के यज्ञ-कुंड में शिवप्रिया सती ने अपनी आहुति दे दी थी। इसे देखकर शिव ने रौद्र रूप धारण कर लिया। उन्होंने सती को अपने कंधे पर लादकर अंतरिक्ष में चक्कर काटना शुरू कर दिया। सड़ते हुए शव को, देवताओं के अनुरोध पर विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से टुकड़े-टुकड़े कर दिया। जहां-जहां ये टुकड़े गिरे, वहां-वहां एक शक्तिपीठ का निर्माण हो गया।

ऐसे इक्यावन शक्तिपीठों के अलावा, कुछ ऐसे भी शक्तिपीठ हैं, जो सती के अंगों के कारण नहीं बने। उस स्थान पर श्रद्धालु युगों से देवी की पूजा करते आ रहे हैं, इसलिए वह स्थान ऊर्जा-पूरित हो गया और उसे शक्तिपीठ की संज्ञा मिल गई। ऐसे स्थानों में हिमाचल की चिंत्यपूर्णी, नैनीताल की नैना देवी, प्रसिद्ध तीर्थस्थान वैष्णो देवी, उत्तार प्रदेश की विंध्यवासिनी आदि के नाम लिए जा सकते हैं। इसलिए कई स्थानों पर शक्तिपीठों की संख्या एक सौ आठ बताई जाती है।

मातृ-स्वरूपा शक्ति

शक्ति के रूप में उपासना का एक महत्वपूर्ण कारण यह है कि शक्ति देवी-रूपा या मातृ-स्वरूपा हैं। माता के अंदर वात्सल्य-भाव मौजूद होता है। वे करुणामयी हैं। भक्तों की विपत्तिा-आपत्तिसहन नहीं कर पाती हैं। इसलिए ऐसा माना जाता है कि इनसे की गई प्रार्थना तत्काल और निश्चित फल देती है। ऐसी सर्वशक्तिमयी माता के रहते किसी और की आराधना-पूजा क्यों की जाए? यही विश्वास हमें शक्ति साधना की ओर प्रेरित करता है।

डॉ. भगवतीशरण मिश्र

Friday, September 4, 2009

इसी काम के लिए प्रिंसिपल इनको अपने करीब रखता है,


ये हमारे गुरूजी है जो मुझे एनोतोमी पढाते है, उसके बदले लड़कियों के अंगो को स्पर्श करते है और अपनी गाड़ी में बैठा कर ले आते ले जाते है इसी काम के लिए प्रिंसिपल इनको अपने करीब रखता है, लड़कियों से गन्दी गन्दी बातें करना इनकी आम आदत है ? पर क्या करू मई जो जाट जट्टा ठहरा कुछ भी हो मुझे तो इनसे नंबर चाहिए? इनके फोन सुनाऊ........................या इनके फोन की रिकॉर्डिंग सुनिए ?


बहुत बुरा लगा था पीछे बैठ..................

बहुत बुरा लगा था पीछे बैठना

Sep 04, 10:24 pm

यह संयोग भारत में ही संभव हो सकता था कि एक शिक्षक राष्ट्रपति बन जाए और एक राष्ट्रपति शिक्षक। बात हो रही है क्रमश: डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन (जिनका जन्मदिन आज शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जा रहा है) और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की, जो राष्ट्रपति पद से मुक्त होने के बाद कई शिक्षण संस्थानों में अतिथि शिक्षक के रूप में सेवा दे रहे है। आओ, जानते है डॉ. कलाम के स्कूली दिनों और उन शिक्षकों के बारे में, जिन्होंने उन पर प्रभाव डाला -

मेरा जन्म मद्रास राज्य के रामेश्वरम् कस्बे में एक मध्यमवर्गीय तमिल परिवार में हुआ था। मेरे पिता जैनुलाबदीन की कोई बहुत अच्छी औपचारिक शिक्षा नहीं हुई थी और न ही वे कोई बहुत धनी व्यक्ति थे। इसके बावजूद वे बुद्धिमान थे और उनमें उदारता की सच्ची भावना थी। मेरी मां, आशियम्मा, उनकी आदर्श जीवनसंगिनी थीं। हम लोग अपने पुश्तैनी घर में रहते थे। रामेश्वरम् की मसजिदवाली गली में बना यह घर पक्का और बड़ा था।

[बहुत बुरा लगा था पीछे बैठना]

बचपन में मेरे तीन पक्के दोस्त थे- रामानंद शास्त्री, अरविंदन और शिवप्रकाशन। जब मैं रामेश्वरम् के प्राइमरी स्कूल में पांचवीं कक्षा में था तब एक नए शिक्षक हमारी कक्षा में आए। मैं टोपी पहना करता था, जो मेरे मुसलमान होने का प्रतीक था। कक्षा में मैं हमेशा आगे की पंक्ति में जनेऊ पहने रामानंद के साथ बैठा करता था। नए शिक्षक को एक हिंदू लड़के का मुसलमान लड़के के साथ बैठना अच्छा नहीं लगा। उन्होंने मुझे पीछे वाली बेंच पर चले जाने को कहा। मुझे बहुत बुरा लगा। रामानंद भी मुझे पीछे की पंक्ति में बैठाए जाते देख काफी उदास नजर आ रहा था। स्कूल की छुट्टी होने पर हम घर गए और सारी घटना अपने घरवालों को बताई। यह सुनकर रामानंद के पिता लक्ष्मण शास्त्री ने उस शिक्षक को बुलाया और कहा कि उसे निर्दोष बच्चों के दिमाग में इस तरह सामाजिक असमानता एवं सांप्रदायिकता का विष नहीं घोलना चाहिए। उस शिक्षक ने अपने किए व्यवहार पर न सिर्फ दु:ख व्यक्त किया, बल्कि लक्ष्मण शास्त्री के कड़े रुख एवं धर्मनिरपेक्षता में उनके विश्वास से उस शिक्षक में अंतत: बदलाव आ गया।

[रसोई के रास्ते टूटी रूढि़यां]

प्राइमरी स्कूल में मेरे विज्ञान शिक्षक शिव सुब्रह्मण्य अय्यर कट्टर ब्राह्मण थे, लेकिन वे कुछ-कुछ रूढि़वाद के खिलाफ हो चले थे। वे मेरे साथ काफी समय बिताते थे और कहा करते, 'कलाम, मैं तुम्हे ऐसा बनाना चाहता हूं कि तुम बड़े शहरों के लोगों के बीच एक उच्च शिक्षित व्यक्ति के रूप में पहचाने जाओगे।' एक दिन उन्होंने मुझे अपने घर खाने पर बुलाया। उनकी पत्नी इस बात से बहुत ही परेशान थीं कि उनकी रसोई में एक मुसलमान को भोजन पर आमंत्रित किया गया है। उन्होंने अपनी रसोई के भीतर मुझे खाना खिलाने से साफ इनकार कर दिया। अय्यर जी अपनी पत्नी के इस रुख से जरा भी विचलित नहीं हुए और न ही उन्हे क्रोध आया। उन्होंने खुद अपने हाथ से मुझे खाना परोसा और बाहर आकर मेरे पास ही अपना खाना लेकर बैठ गए। मै खाना खाने के बाद लौटने लगा तो अय्यर जी ने मुझे फिर अगले हफ्ते रात के खाने पर आने को कहा। मेरी हिचकिचाहट को देखते हुए वे बोले, 'इसमें परेशान होने की जरूरत नहीं है। एक बार जब तुम व्यवस्था बदल डालने का फैसला कर लेते हो तो ऐसी समस्याएं सामने आती ही है।' अगले हफ्ते जब मैं उनके घर रात्रिभोज पर गया तो उनकी पत्नी ही मुझे रसोई में ले गई और खुद अपने हाथों से मुझे खाना परोसा।

[तीन ताकतों को समझने का सबक]

15 साल की उम्र में मेरा दाखिला रामेश्वरम् के जिला मुख्यालय रामनाथपुरम् स्थित श्वा‌र्ट्ज हाई स्कूल में हुआ। मेरे एक शिक्षक अयादुरै सोलोमन बहुत ही स्नेही, खुले दिमागवाले व्यक्ति थे और छात्रों का उत्साह बढ़ाते रहते थे। रामनाथपुरम् में रहते हुए अयादुरै सोलोमन से मेरे संबंध काफी प्रगाढ़ हो गए थे। वे कहा करते थे, 'जीवन में सफल होने और नतीजों को हासिल करने के लिए तुम्हे तीन प्रमुख शक्तिशाली ताकतों को समझना चाहिए- इच्छा, आस्था और उम्मीदें।' उन्होंने ही मुझे सिखाया कि मैं जो कुछ भी चाहता हूं, पहले उसके लिए मुझे तीव्र कामना करनी होगी, फिर निश्चित रूप से मैं उसे पा सकूंगा। वे सभी छात्रों को उनके भीतर छिपी शक्ति एवं योग्यता का आभास कराते थे। वे कहा करते थे- 'निष्ठा एवं विश्वास से तुम अपनी नियति बदल सकते हो।'

[पिटाई के बाद मिली प्रशंसा]

श्वा‌र्ट्ज हाई स्कूल में कक्षाएं अहाते में अलग-अलग झुंडों के रूप में लगा करती थीं। एक दिन मेरे गणित के शिक्षक रामकृष्ण अय्यर किसी दूसरी कक्षा को पढ़ा रहे थे। अनजाने में ही मैं उस कक्षा से होकर निकल गया। तुरंत ही उन्होंने मुझे गरदन से पकड़ा और भरी कक्षा के सामने बेंत लगाए। कई महीनों बाद जब गणित में मेरे पूरे नंबर आए तब रामकृष्ण अय्यर ने स्कूल की सुबह की प्रार्थना में सबके सामने यह घटना सुनाई और कहा, 'मैं जिसकी बेंत से पिटाई करता हूं, वह एक महान् व्यक्ति बनता है। मेरे शब्द याद रखिए, यह छात्र विद्यालय और अपने शिक्षकों का गौरव बनने जा रहा है।' आज मैं सोचता हूं कि उनके द्वारा की गई यह प्रशंसा क्या एक भविष्यवाणी थी?